Highlights of cricket with full summary
क्रिकेट
क्रिकेट खेल का इतिहिस
History of Cricket Game
क्रिकेट अंग्रेजों की दी हुई खेल है। जहां-जहां पर ब्रिटिश लोगों ने राज्य किया वहां-वहां उन्होंने इस खेल को
प्रचलित किया। पश्चिमी खेलें संसार के लगभग सभी देशों में खेली जाती हैं, वहीं क्रिकेट केवल सात-आठ देशों में ही
खेली जाती है। क्रिकेट खेलने वाले विशेष देश जैसे इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, वैस्टइंडीज़, दक्षिणी अफ्रीका, न्यूज़ीलैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका और भारत हैं। भारतवर्ष की धरती पर यह खेल सब से पहले 1725 के आसपास बर्तानवी मल्लाहों के टीमों के बीच खेली गई। फिर अंग्रेज़ लोग फौजी छावनियों में यह खेल खेलने लग पड़े। सन् 1972 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों ने मिल कर इडन गार्डन कोलकाता में क्रिकेट क्लब को बनाया। कोलकाता क्रिकेट क्लब बनाने के पांच वर्ष बाद मुम्बई की फौजी टीम के साथ मुम्बई शहर की टीमों में मैच खेला गया। 1804 में कोलकाता (old) ओल्ड इटोनियन्ज और सैंटलमैन ऑफ़ कोलकाता की टीमों के बीच एक और क्रिकेट मैच खेला गया। इस मैच में ओल्ड इटोनियन्ज के रॉबर्ट वैनिसटार्ट ने भारतीय धरती पर पहले सौ रन बनाए। उस समय तक यह खेल केवल अंग्रेज़ ही खेलते थे और भारतीय लोग केवल दर्शक होते थे। 1846 में चेन्नई क्रिकेट क्लब की स्थापना की गई।
भारत में सबसे पहले पारसियों ने इस खेल को अपनाया। इसका कारण अमीर पारसियों के अंग्रेजों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। 1850 में क्रिकेट को भारत में प्रोत्साहित करने के लिए यंग जोरासटूरियन्ज़ क्लब बन गए। 1877 में पारसियों और यूरोपियों में क्रिकेट का मैच खेला गया, जो यूरोपियों ने 63 दौड़ों से जीत लिया। पारसियों की टीम मज़बूत बनाने के लिए डॉ० डी० एच० पटेल इंग्लैण्ड से क्रिकेट के तकनीकी नुक्ते सीख कर भारतीयों को ये खेल सिखलाने लगे। 1884 ई० में सर दोराब टाटा ने पारसी जिमखाना की स्थापना की पारसियों की देखा-देखी सन् 1778 में हिन्दू क्रिकेट क्लब अस्तित्व में आया और क्रिकेट का विस्तार होने लगा। सन् 1886 में भारत से केवल पारसियों की क्रिकेट टीम इंग्लैण्ड के दौरे पर गई। वहां पर उन्होंने 28 मैच खेले जिनमें से केवल एक ही जीत पाए, अठारह मैच हारे और शेष में बराबर रहे। दो वर्ष के पश्चात् पारसियों की दूसरी टीम इंग्लैण्ड में मैच खेलने गई। इस समय वह 8 मैचों में विजय प्राप्त कर सके और 11 मैचों में हार का सामना करना पड़ा और 12 मैच बराबरी पर छूटे। भारतीय टीम के निमन्त्रण पर 1890 में पहली बर्तानवी टीम भारत के दौरे पर आई। उसने दस (10) मैचों में विजय प्राप्त की, (1) एक मैच बराबरी पर छूटा और (1) एक मैच हारे। 1892-1893 में इंग्लैण्ड की दूसरी टीम भारत में मैच खेलने के लिए आई। एक मैच में पारसियों ने लॉर्ड हॉक की टीम को हरा दिया। भारतीय पारसियों की टीम ने 93 रन और
182 दौड़ें बनाईं जबकि अंग्रेज़ 73 और 93 दौड़ें ही बना सके। दूसरे सभी मैचों में विदेशी टीम को ही विजय प्राप्त हुई। 1902-03 में इंग्लैण्ड की तीसरी टीम ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी आथैटिक्स ने भारत का भ्रमण किया। यहां पर उन्होंने केवल 19 मैच खेले, जिनमें से 12 मैचों में विजय प्राप्त की। दो मैचों में विदेशी टीम हार गई और पांच मैच बराबर रहे। उस समय मुम्बई और पूना में भी मैच खेले जाते थे, जो पारसियों और यूरोपियों के बीच में होते थे। सन् 1907 से प्रैजिडेंसी क्रिकेट टूर्नामैंट में हिन्दू-क्रिकेट क्लब की टीम के सम्मिलित होने के साथ मुम्बई में ये मैच तीन टीमों के बीच में होने लगे। पहले दो टीमें एक-दूसरी विरोधी टीम के साथ मैच खेलती। विजय प्राप्त करने वाली टीम फिर तीसरी विरोधी टीम के साथ
मैच खेलती। इस तरह का खेल सन् 1911 तक चलता रहा। दूसरी तरफ मुसलमानों ने अपनी क्रिकेट क्लब मुसलमान
जिमखाना बना ली थी जिसका नाम इस्लाम जिमखाना पड़ गया। सन् 1912 में मुसलमानों ने अपनी क्रिकेट टीम को मुम्बई के टूर्नामैंट में सम्मिलित किया और प्रेज़िडेंसी मैच चार टीमों के बीच में होने लगे। सन् 1937 में यहूदी और भारतीय ईसाइयों की टीम के इस टूर्नामैंट में सम्मिलित होने से यह मैच 5 टीमों के बीच में होने लगा।
पहली सर्व भारतीय क्रिकेट टीम 1911 में इंग्लैण्ड के दौरे पर गई। उस टीम के कप्तान महाराजा भूपिन्द्र सिंह थे।
इंग्लैण्ड में भारतीय टीम ने 23 मैच खेले जिनमें 6 मैचों में विजय प्राप्त की। 2 मैच बराबर रहे और 15 में हार का सामना करना पड़ा। फिर पहले विश्वयुद्ध के कारण कोई भी टीम एक-दूसरे के देश का दौरा न कर सकी। 19 अक्तूबर, 1926 को एस० सी० सी० (M.C.C.) इंग्लैण्ड की टीम भारत के दौरे पर आई। इस टीम ने कराची, रावलपिंडी, लाहौर, अजमेर, मुम्बई, कोलकाता, रंगून, चेन्नई, श्रीलंका, अलीगढ़, दिल्ली और पटियाला में 31 मैच खेले। 22 नवम्बर, 1927 को भारत में भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड की स्थापना हुई और भारत इम्पीरियल क्रिकेट कान्फ्रेंस का सदस्य बन गया। 1932 में भारत को टैस्ट मैच खेलने की मान्यता प्राप्त हुई। इस तरह टैस्ट मैच खेलने के लिए भारतीय टीम पोरबन्दर के महाराजा नटवर सिंह की कप्तानी में 1932 में इंग्लैण्ड पहुंची। लीमड़ी का राजकुमार घनश्याम सिंह भारतीय टीम के उप कप्तान बने और मैच खेलते समय खेल मैदान में वास्तविक कप्तानी की भूमिका सी० के० नायडू ने
की। इस प्रकार क्रिकेट टीमों का आदान-प्रदान होने लगा। पहला टेस्ट मैच 15, 17, 18 दिसम्बर को मुम्बई में हुआ जिसके कप्तान सी० के० नायडू थे जिन्होंने टास तो जीत लिया पर मैच 9 विकेटों पर हार गए। दूसरा टेस्ट मैच कोलकाता में हुआ जो बराबर छूटा, तीसरा टेस्ट मैच चेन्नई में खेला गया जो एम० सी० सी० ने 202 दौड़ों से जीत लिया। इस टैस्ट की विशेष बात यह है कि लाला अमरनाथ ने अपने पहले ही टैस्ट मैच में भारतीय खिलाड़ियों में से पहला शतक बनाया। पिछले 70 वर्षों में भारतीय क्रिकेट टीम में बहुत-से उतार-चढ़ाव आए इन वर्षों में भारतीय क्रिकेट टीम ने संसार की शक्तिशाली टीमों को पराजित भी किया और कई बार उनसे भी पराजित हुई। नवाब पटौदी, अजीत वाडेकर, बिशन सिंह
बेदी, वेंकट राघवन और सुनील गावस्कर जैसे चोटी के खिलाड़ी जिन्होंने क्रिकेट में नाम कमाया, कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, मुहम्मद अजहरुद्दीन भी क्रिकेट के क्षेत्र में चमकते सितारे बने जो एक दिवसीय पचास ओवरों के मैचों में कई बार शतक बना चुके हैं। भारत के फिरकी गेंदबाज़ बेदी, प्रसन्ना, चन्द्रशेखर से दुनिया के सभी बैट्समैन डरा करते थे। भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड की तरफ से राष्ट्रीय क्रिकेट चैम्पियनशिप के अतिरिक्त कई दूसरे महत्त्वपूर्ण टूर्नामेंट भी करवाए जाते हैं। 1935 में रोहिंटन बारीया ट्राफी के लिए अन्तर यूनिवर्सिटीज़ के लिए मैच 1945 से प्रारम्भ है और यह ट्रॉफी अन्तर प्रादेशिक स्कूल चैम्पियनशिप को दी जाती है। 1960 में दिलीप ट्रॉफी स्थापित की गई और अन्तर-क्षेत्रीय
टूर्नामैंट में विजय प्राप्त करने वाले इस को प्राप्त करते हैं।
इस समय क्रिकेट पर मैच फिक्सिग के काले बादल छाए हुए हैं। हमें आशा रखनी चाहिए कि यह बादल शीघ्र समाप्त हो जाएंगे और क्रिकेट अपना गौरव खेल जगत् में बनाए रखने में सफल हो जाएगी।
क्रिकेट के नये साधारण नियम
(Latest General Rules of Cricket)
(क) खिलाड़ी (Players) क्रिकेट का मैच दो टीमों के बीच ही होता है और इसमें हरेक टीम के खिलाड़ी भाग
लेते हैं । हरेक टीम का एक खिलाड़ी कैप्टन होता है। अगर कैप्टन अनुपस्थित हो तो वाइस-कैप्टन ही कैप्टन की भूमिका अदा करता है। इनिंग्स के लिए टॉस से पहले कैप्टन द्वारा खिलाड़ियों का नामांकन किया जाता है।
(ख) सबस्टीटयूट्स या अतिरिक्त खिलाड़ी (Substitutes)
1. मैच के दौरान किसी खिलाड़ी के बीमार होने की दशा में या चोटग्रस्त होने पर उसके स्थान के अतिरिक्त खिलाड़ी
को अवसर दिया जायेगा
2. अतिरिक्त खिलाड़ी को केवल फील्डिंग (Fielding) के लिए बदला जाएगा, बैटिंग या बॉलिंग के लिए नहीं।
3. मैच के दौरान एक चोटग्रस्त या बीमार बैट्समैन के लिए एक रनर दिया जा सकता है। यह खिलाड़ी जो रनर के रूप में खेलता है, वह बैटिंग टीम का मैंबर होगा।
(ग) बाऊंडरीज (Boundaries) हालांकि विकेट से बाऊंडरीज़ की दूरी निश्चित नहीं होती, पर यह 75 से 85 गज हो सकती है। इसलिए हरेक जगह पर खेल का मैदान अलग-अलग आकार (Size) का होता है।
(घ) फॉलो आन (Follow on) यह टीम, जो पहले बैटिंग करती हैं और पाँच दिवसीय मैच में 200 रन की लीड
तीन दिवसीय मैच में 150 रन की लीड, दो दिवसीय मैच में 100 रन की लीड ले लेती है, तब वह विरोधी टीम को अपनी इनिंग्स को फॉलो.आन के लिए कह सकती है।
(ङ) ओवर (Over)-बॉलिंग, हरेक विकेट से बार-बार साथ ही करनी चाहिए। एक ओवर में 6 से 8 बॉल हो
सकती हैं। नो बॉल और वाइड बॉल ओवर में नहीं गिनी जाती।
(च) बैट्समैन का आऊट होना (Bastman getting out)
1. जब वह बोल्ड (Bowled) हो जाए।
2. जब बॉल को स्ट्रोक लगाने के बाद, मैदान में गिरने या छूने से पहले फील्डर कैच कर ले। इस दशा में फील्डर के
3. जब वह बॉल हैंडल कर लेता है।
4. जब वह बॉल को दोबारा हिट करता है।
5. जब वह लैग बिफोर विकेट (L.B.W.) होता है।
6. खेल के दौरान अर्थात् जब बॉल खेली जा रही हो और खिलाड़ी क्रीज के बाहर आ जाए तो वह रन आऊट होता है।
उस समय फील्डर उसका विकेट बॉल से उखाड़ देता है।
7. जब उसका बैट, ड्रैस या शरीर विकटों को छू जाए।
8. वह स्टम्प किया जाता है
9. जब वह जानबूझ कर फील्डर के सामने रुकावट पैदा करते हैं।
10. विकेट गिराने के उपरांत आदि अगला बैट्समैन जान-बूझ कर मैदान में आने के लिए दो मिनट से ज्यादा समय लेता है तब वह आऊट हो जाता है।
ट्वंटी-20 मैच संबंधित नियम (Rules Related to 20-20 Match)
1. हरेक टीम 20 ओवर के लिए बल्लेबाजी करेगी।
2. एक मैच की अवधि 3 घंटे की होगी। पारियों के मध्य 20 मिनट का मध्यांतर होगा।
3. एक मैच पूरा होने के लिए कम से कम 5 ओवर हरेक टीम द्वारा पूरे किये जाने जरूरी हैं।
4. आने वाले बल्लेबाज को 90 सैकिण्ड के अंदर अगली बॉल का सामना करना होगा। इसलिए मैच के दौरान टीम को पैवेलियन के स्थान पर सीमा-रेखा के नजदीक बैठना होगा।
5. दोनों टीमों को अपनी-अपनी पारी 75 मिनट में समाप्त करनी होती है। अगर क्षेत्र रक्षण करने वाली टीम इस तरह करने में असफल होती है तो बल्लेबाजी करने वाली टीम को बोनस के तौर पर प्रति ओवर 6 रन प्रदान किए जाएंगे।
6. एक बल्लेबाज को मैदान में पहुँचने के लिए 90 सैकिंड मिलते हैं। अगर यह इस तरह नहीं करता तो उसको टाइम आऊट का नाम दिया जाता है।
7. पहले 6 ओवर में केवल दो क्षेत्ररक्षक 30 गज के दायरे के बाहर रह सकते हैं। शेष 14 ओवर में 5 से ज्यादा।
क्रिकेट खेल की महत्त्वपूर्ण तकनीक
क्रिकेट में बैटिंग निपुणता और तकनीकें
(Expertise batting and Techniques)
बैटिंग (Batting)-किसी भी हिट को सफलतापूर्वक खेलने के लिए बैट्समैनों को तीन बातों का ध्यान रखना
चाहिए। उसे अवश्य ही पहले बाल को ढूढ़ना चाहिए और तब निरन्तर बाल की ओर ध्यान रखना चाहिए। उसे यह निर्णय देना होता है कि कौन-सी हिट ठीक है। उस हिट को ठीक तरह से खेलने के लिए अपने बदन को छोड़ना चाहिए। पहले कहने को तो काफ़ी आसान है परन्तु वास्तव में इतना आसान नहीं है। यह बात सोचनी तो आसान है कि तुम बाल की ओर देख रहे हो। यह वास्तव में किसी आ वह बाल को देखना आसान है बशर्ते कि तुमने अपना मन बनाया हुआ हो। किन्तु पूरी पारी में प्रत्येक बाल की जांच करने की आदत डालनी, सही अर्थों में जांच करना एक बड़ा कठिन कार्य है। आप ऐसा केवल अपने हाथ के कार्य पर ध्यान केन्द्रित करना माँख कर ही कर सकते हो। यह वास्तव में बड़ा कठिन है, परन्तु यदि तुम इस प्रकार करना सीख लेते हो तो तुम्हें क्रिकेट में ही सहायक सिद्ध नहीं होगा बल्कि जीवन में भी। अच्छी प्रकार निर्णय करना कि किसी विशेष बाल को किस तरह हिट करना है यह एक प्रकार से अन्तर-प्रेरणा का साधन है या जिसे प्रायः क्रिकेट में बाल सूझ कहा जाता है। कारण यह मुख्यतः अनुभव का कार्य है।
खिलाड़ी की स्थिति (Position the Player)-खिलाड़ी की आरामदायक, तनावहीन तथा संतुलित स्थिति बनी
रहनी आवश्यक है। बाल की ठीक परख करना और प्रत्येक स्ट्रोक के लिए पांव की हिल-डुल इस पर ही निर्भर करती है। पांव साधारणतः क्रीज की ओर समानान्तर होनी चाहिए और इनके पंजे लक्ष्य की ओर होने चाहिएं।
बैक लिफ्ट (Back lift)—एक ठीक बैक लिफ्ट का बहुत महत्त्व है। बायां बाजू और कलाई को ही समस्त कार्य
करना चाहिए और बैट को आसानी से लक्ष्य की ओर, जैसे कि बैट उतरता है। सिर और बदन बिल्कुल स्थिर होने चाहिएं। उधार के सिरे पर दाईं कुहनी बदन से कुछ पीछे होनी चाहिएं और बायां हाथ पैंट की दाईं जेब के बिल्कुल सामने ऊपर की ओर होना चाहिए। बैट नीचे की ओर इच्छुक हिट की रेखा पर घूमना चाहिए। प्रहार के समय लिफ्ट कुदरती है कि अधिक परिपक्व हो।
सीधे बाल को सामने की सुरक्षा हिट (The forward stock in defence for the straight)—सामने की हिट
सुरक्षा में न केवल बहुमूल्य है, बल्कि सब हिटों का आधार भी है। इसे ठीक ढंग से खेलना लगभग आधा बाल बैट्समैन बनने के तुल्य है। उद्देश्य बाल को जितना प्वाइंट के निकट से निकट सम्भव हो सके, खेलने का है।
सिर आगे की ओर बढ़ाते, बायां कूल्हा और कन्धा बाल की रेखा से बाहर रख कर बाल को बैट पर बाएं पांव से
कुछ इंच सामने लेना होता है और बीच की सेध में होना चाहिए। बदन का बोझ मुड़े हुए बाएं घुटने से बिल्कुल सामने की ओर हो। बाल की समस्त मार्ग परख करो। इस तरह करने से तुम्हें अपना सिर जहां तक हो सके, सन्तुलन में रखना चाहिए। सिर ऊपर उठाने का लोभ कम करो।
हिट में नियन्त्रण आवश्यक है (Control in Hits)-यदि तुम मज़बूत हिट मारना चाहते हो तो तुम्हारी हिट घूमने
की अपेक्षा अधिक अच्छी लम्बी हो सकती है। बाल को साफ़-साफ़ व आसान ढंग से हिट करने के लिए उसे सीमा (बाऊंडरी) की ओर फेंकने की अपेक्षा मैदान में
फेंकना चाहिए। यदि बाल काफ़ी दूर ऊपर है तो हिट एक ही लम्बे कदम से भरी जा सकती है। मगर तुम्हें पिच पर कम गति, तेज़ व अधूरे (Shorter) बाल को खेलने के लिए पांव का प्रयोग करना भी सीखना चाहिए।
आफ़ ड्राइव में सबसे आवश्यक बात यह है कि सिर, बायां कन्धा और कमर बाल की रेखा पर होने चाहिए। यदि यह ताक दिशा में होंगे तो बायां पांव अपने आप ही ठीक दिशा में काम करेगा। पहुंच से बाहर बाल और साधारण बाल को प्राप्त करने के लिए बाएं कन्धे की पीठ गेंद करने वाले की ओर होनी चाहिए और आफ़ साइड की ओर हिट का लक्ष्य होना चाहिए। वास्तव में अपनी नीचे की ओर गति फाइन लैग की रेखा से आरम्भ करेगा। जहां तक सम्भव हो सके बैट का पूरा भाग हिट की रेखा द्वारा घूमना चाहिए।युवकों में आन ड्राइव की योग्यता बहुत कम ही है। मगर यदि वह इसे हासिल कर लें तो वे अपने रन बनाने की सामर्थ्य इससे पहली हरकत बाएं कन्धे को हल्का-सा नीचे रखना है। इस प्रकार बाएं पांव और सन्तुलन रेखा को ठीक रखने, सिर को आगे की ओर करके बाल की रेखा पर आने की सहायता मिलेगी। बायां पांव रेखा से हल्का-सा दूर होगा। बैट्समैन को हिट का निशाना लेना चाहिए और अन्तिम बैट की चौड़ाई की ओर से नीचे घूमना चाहिए। बैट्समैन को अपनी आन ड्राइव दाएं हाथ और दाएं कन्धे से अधिक काम लेने की रुचि को दृढ़ता से कम करना होगा। उसे अपने बाएं कूल्हे को भी दूर होने की आज्ञा नहीं देनी चाहिए।
जब तक एक बैट्समैन बाल के आकर्षण को अच्छी प्रकार पड़ताल नहीं कर लेता तो उसे बैक स्ट्रोक से ही खेलना चाहिए और इस प्रकार उसे बाल के आकर्षण के पश्चात् जांच करने का समय भी मिलेगा। हल्की बाल और अधिक कठिन विकट में उसे अवश्य ही बैक स्ट्रोक पर निर्भर करना चाहिए। दायां पांव क्रीज़ की ओर पंजा समानान्तर रहते बाल की रेखा के भीतर और पीछे की ओर अच्छी प्रकार हिल-डुल कर सकता है। बदन का बोझ इस पांव पर बदली किया जा सकता है परन्तु सिर आगे की ओर झुका हुआ होना चाहिए। बाएं पांव पर होते हुए एक संतुलनीय-सा कार्य करता है। बाल दृष्टि से कुछ नीचे मिलना चाहिए जोकि जितना सम्भव स्तर हो सके होना चाहिए क्योंकि वह बाल को नीचे पिच की ओर झांकती है। हिट पर नियन्त्रण बाएं हाथ से बाजू की ओर से कोहनी ऊपर उठा कर किया जाता है। दायां हाथ अंगूठे पर अंगुलियों की पकड़ में आरामदायक होता है। बदन को जितना सम्भव हो सके साइडों की ओर रखना चाहिए। एक लड़का जब तक सीधी हिट नहीं मारना सीखता तब तक बैट्समैन नहीं बनता परन्तु उसे पूरे भाव से अनुचित बाल से खेलने का ढंग भी होना चाहिए। यह बात विशेष तौर पर लम्बे टिप्पों और पूर्ण उछाल में वास्तविकता लगती है और विशेषत जूनियर क्रिकेट में चौके मारने के उत्तम अवसर प्रदान करती है।
ये हिटें अधिक आसान होती हैं, क्योंकि यह सीधी बैट हिटों से अधिक प्राकृतिक होती हैं, परन्तु इनको दृढ़ता से खेलने के लिए तुम्हें चतुराई से खेलने का ढंग सीखना चाहिए। पिछले पांव का स्कवेयर कट बाल रेखा और प्वाइंट पर सामने से या पीछे मिले बाल से निपटने के लिए दाएं पांव दाएं कूल्हे के आर-पार घूमता है। तब कलाइयों और हाथों को एक ऊंची बैक लिफ्ट से नीचे घुमाया जाता है और सिर व बदन, झुके हुए दाएं घुटने और स्ट्रोक रेखा में घूमता है।
पंच यह हिट भी ऊपरी हिट जैसी ही है, सिवाय इसके कि यह बाएं कन्धे से अधिक घुमाव से आरम्भ होती है और दायां पांव थर्ड स्लिप की ओर से पंजे की ओर भूमि पर होता है। बाल विकटों की सतह के बराबर मिलता है और कलाई आगे बढ़ाते बैट्समै। इसे गुल्ली या स्लिप की दिशा में हिट करता है। इन दोनों कट्स में बायां पांव पंजे पर विश्राम अवस्था में रहता है और बोझ झुके हुए दाएं घुटने पर पूरी तरह रहता है।
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